शनि प्रदोष व्रत की कथा

प्राचीन काल में एक धर्मनिष्ठ दयालु हृदय का सेठ रहता था। वह धन दौलत से सम्पन्न था। उसके यह से कभी कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता था। वह सभी को मन भर के दान दक्षिण देता था।

लेकिन दूसरों को दान बाटने वाले सेठ एवं उसकी पत्नी दोनों स्वयं दुखी थे। निःसंतान होने के कारण दोनों अंदर ही अंदर तकलीफ में थे।

एक दिन पति पत्नी दोनों ने तीर्थ यात्रा पर जाने का निर्णय लिया। और अपना सारा काम काज नौकरों को दे कर तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े। अभी वह नगर से निकले ही थे की उन्हे एक पेड़ के नीचे साधु दिखाई दिए।

दोनों ने सोचा की आगे की यात्रा को हम साधु महात्मा की आशीर्वाद लेने के पश्चात करेंगे। और वह पति पत्नी समाधि में लीन साधु के आगे हाथ जोड़ बैठ गए। और उनकी समाधि से उठने का इंतजार करने लगे।

इंतजार करते-करते सुबह से शाम तथा रात हो गई लेकिन साधु महराज की समाधि नहीं टूटी। मगर सेठ एवं उनकी पत्नी धैर्यपूर्वक साधु महराज के समाधि से उठने का इंतजार करते रहे। दूसरे दिन जब साधु महाराज समाधि से उठे तो सेठ और उसकी पत्नी को देख कर मुस्कुराने लगे।

और बोले की मै तुम्हरे अंदर की व्यथा को जानता हु। और मै तुम्हरे भक्ति भाव से खुश हु ओर आशीर्वाद दिया। और पुत्रप्राप्ति के लिए साधु महराज ने उन्हे शनि प्रदोष व्रत करने के लिए उन्हे सारी विधि बताई और भगवान शिव की वंदना करने को बोला।

तीर्थयात्रा से लौटने के पश्चात सेठ और उसकी पत्नी नियमपूर्वक शनि प्रदोष व्रत एवं कथा करने लगे। कुछ दिनों पश्चात भोलनाथ के आशीर्वाद से सेठ की पत्नी ने एक बालक को जन्म दिया। तथा शनि प्रदोष व्रत के प्रभाव से नकारात्मक प्रभाव का अंत हो गया।

अतः जो भी व्यक्ति शनि प्रदोष व्रत भक्ति भाव और सच्चे मन से करता है उसका कल्याण होता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

We appreciate you contacting us
Have a great day!

Benifits of chalisa, हिंदू धर्म में चालीसा क्या है?

चालीसा शब्द की उत्पत्ति चालिस शब्द से हुई है, जिसका अर्थ अंकों में 40 है। चालीसा एक भक्ति गीत हैं। चालीसा में 40 (४०) चौपईयाँ होती है। चालीस...