|| दोहा ||
श्री राधा पद कमल रज, सिर धरि यमुना कूल।
वर्णों चालीसा सरल, सकल सुमंगल मूल॥
|| चउपाई ||
जय जय पूरण ब्रह्म बिहारी, दुष्ट दलन लीला अवतारी।
जो कोई तुम्हारी लीला गावै, बिन श्रम सकल पदार्थ पावै॥
जय गोपाल जय गोपाल।
देहु दिव्य वृंदावन वासा, छूटे मृग तृष्णा जग आसा।
तुम्हारे ध्यान धरत शिव नारद, सुख सनकादिक ब्रह्म विशारद॥
जय जय राधा रमण कृपाला, हरन सकल संकट भ्रम जाला।
बिन सहे बिघन रोग दुख भारी, जो सुमरे जगपति गिरधारी॥
कंस वध किये ब्रज रक्षा, उद्धव सन देश विदेशा।
गोपियों संग रास रचाया, प्रेम भक्ति का ज्ञान बताया॥
माता पिता की बंदमुक्ति कराई, कौरव पाण्डव संग युद्ध कराई।
दुर्योधन का अंत कराया, धर्म विजय का डंका बजाया॥
धारण कर शंख चक्र गदा, पालनहार संसार सदा।
गजेंद्र की रक्षा तुम कीन्ही, भक्तों के संकट हर लेनी॥
॥ चरण स्पर्श ॥
कहो गोपाल चालीसा जोई, पावे मनोरथ फलदायक होई।
सात दिन निरंतर करे पाठ, कोट जन्म सुखी हो संतोष॥
॥ दोहा ॥
जय रामदेव सदैव सो गुरुदेव, दया सो लहे प्रणत पाल।
अशरण शरण करुणा सिंधु, ब्रजेश चालीसा के संगमो ही अपना वहु प्राणेश॥
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